🌹🙏हरे कृष्ण 🙏🌹

👉 दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान।
तुलसी दया न छांड़िए, जब लग घट में प्राण॥

👉अर्थात् :- तुलसीदास जी कहते हैं, धर्म का मूल भाव ही दया हैं और अहम का भाव ही पाप का मूल (जड़) होता है. इसलिए जब तक शरीर में प्राण है कभी दया को नहीं त्यागना चाहिए।

👉🌹🙏नानी बाई का मायरा”🙏🌹👇

👉 नानी बाई ने (मायरा) भात भरने के लिए नरसी जी को बुलाया.

नरसी जी के पास भात भरने के लिए कुछ नहीं था.

वह निर्धन थे लेकिन भगवान की भक्ति का खजाना भरपूर था.

वो कहते थे कि -हमें अपनी चिंता क्यों करनी, हमारी चिंता करने के लिए भगवान बैठे हैं.

जब नरसी जी के पास भात का सन्देश आया तो सामानों की लिस्ट देखकर चिंतित हो उठे और अंतर्मन से अपने भगवान को पुकारा –

“हे साँवरिया सेठ ! हे गिरधारी !
नरसी मेहता को तो कोई नहीं जाने। तुमको जाने है दुनिया सारी,

नानी बाई की पुत्री थी सुलोचना बाई , सुलोचना बाई का विवाह जब तय हुआ था; तब नानी बाई के ससुराल वालों ने यह सोचा कि नरसी एक गरीब व्यक्ति है
तो वह शादी के लिये भात तो भर नही पायेगा,

उनको लगा कि अगर वह साधुओं की टोली को लेकर पहुँचे तो हमारी बहुत बदनामी होगी, इसलिये उनको शादी में आने से रोकने के लिए उन्होंने भात के समान की एक बहुत लम्बी सूची बनाई !

उस सूची में करोड़ों का सामान लिख दिया गया जिससे कि नरसी उस सूची को देखकर खुद ही न आये।

नरसी जी को निमंत्रण भेजा गया !
साथ ही मायरा भरने की सूची भी भेजी गई ,
परन्तु नरसी के पास केवल एक चीज़ थी – वह थी श्री कृष्ण की भक्ति,
इसलिये वे उन पर भरोसा करते हुए अपने संतों की टोली के साथ सुलोचना बाई को आर्शिवाद देने के लिये अंजार नगर पहुँच गये,

उन्हें आया देख नानी बाई के ससुराल वाले भड़क गये और उनका अपमान करने लगे,
अपने इस अपमान से नरसी जी व्यथित हो गये और रोते हुए श्री कृष्ण को याद करने लगे,

नानी बाई भी अपने पिता के इस अपमान को बर्दाश्त नहीं कर पाई और आत्महत्या करने दौड़ पड़ी !
परन्तु श्री कृष्ण ने नानी बाई को रोक दिया और उसे यह कहा कि कल वह स्वयं नरसी भक्त के साथ मायरा भरने के लिये आयेंगे।

दूसरे दिन नानी बाई बड़ी ही उत्सुकता के साथ श्री कृष्ण और नरसी जी का इंतज़ार करने लगी ! और तभी सामने देखती है कि नरसी जी संतों की टोली और एक सेठजी जी के साथ चले आ रहे हैं और उनके पीछे ऊँटों और घोड़ों की लम्बी कतार आ रही है जिनमें सामान लदा हुआ है,

दूर दूर तक बैलगाड़ियाँ ही बैलगाड़ियाँ नज़र आ रही थी,ऐसा मायरा न अभी तक किसी ने देखा था न ही देखेगा !

यह सब देखकर ससुराल वाले अपने किये पर पछताने लगे,
उनके लोभ को भरने के लिये द्वारिकाधीश ने बारह घण्टे तक स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा की नानी बाई के ससुराल वाले उस सेठ को देखते ही रहे और सोचने लगे कि ये सेठ कौन है।

और ये नरसी जी की मदद क्यों कर रहा है, जब उनसे रहा न गया तो उन्होंने पूछा कि कृपा करके अपना परिचय दीजिये और आप नरसी जी की सहायता क्यों कर रहे हैं।​

उनके इस प्रश्न के उत्तर में जो जवाब सेठ ने दिया, वही इस कथा का सम्पूर्ण सार है !
तथा इस प्रसंग का केन्द्र भी है, इस उत्तर के बाद सारे प्रश्न अपने आप ही समाप्त हो जाते हैं,
सेठ जी का उत्तर था …

’मैं नरसी जी का सेवक हूँ !
इनका अधिकार चलता है मुझपर !
जब कभी भी ये मुझे पुकारते हैं ,
मैं दौड़ा चला आता हूँ इनके पास, !

जो ये चाहते हैं; मैं वही करता हूँ !
इनके कहे कार्य को पूर्ण करना ही मेरा कर्तव्य है।”

ये उत्तर सुनकर सभी हैरान रह गये और किसी के समझ में कुछ नहीं आ रहा था !

बस नानी बाई ही समझती थी कि उसके पिता की भक्ति के कारण ही श्री कृष्ण उससे बंध गये हैं ,और उनका दुख अब देख नहीं पा रहे हैं।

इसलिये मायरा भरने के लिये स्वयं ही आ गये हैं, इससे यही साबित होता है कि भगवान केवल अपने भक्तों के वश में होते हैं।

🚩💐🚩🙏॥भगवान श्रीकृष्ण से आपकी सपरिवार स्वस्थ और तनावमुक्त सहित कुशलता की कामना करता हूं ॥🙏🚩💐🚩
🚩💐🚩🙏॥प्यार ,सम्मान ,आत्मविश्वास और आस्था के साथ आपका दिन शुभ और मंगलमय रहे ॥🙏🚩💐🚩

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